इंदौर/आई संवाद/ इंदौर में पानी अब सुविधा नहीं, रोज का संघर्ष बन गया है, नलों का कोई टाइम नहीं, टैंकरों का कोई हिसाब नहीं और मोहल्लों में लोग बूंद-बूंद के लिए जूझ रहे हैं। ऊपर से निगम बड़े आराम से 50 साल आगे की प्लानिंग गिना देता है, लेकिन हकीकत ये है कि शहर आज की प्यास से ही हारता नजर आ रहा है। सीधी बात है कि जब सुबह की बाल्टी भरने की गारंटी नहीं है, तो आधी सदी बाद के वादे सिर्फ बयान ही लगते हैं, राहत नहीं।
पानी की किल्लत करो दूर!
शहर में पानी की किल्लत से जनता त्राहि-त्राहि कर रही है, लेकिन जिम्मेदारों का फोकस कहीं और ही नजर आ रहा है। जहां लोगों को पीने के पानी के लिए जूझना पड़ रहा है, वहीं निगम के अधिकारी अपने चहेतों को टेंडर दिलाने के ‘चक्रव्यूह’ रचने में व्यस्त हैं। हालात ये हैं कि बुनियादी जरूरतों को दरकिनार कर प्राथमिकता ऐसे कामों को दी जा रही है, जिनसे सवाल खड़े हो रहे हैं। जनता परेशान है, लेकिन सिस्टम अपने ही खेल में उलझा हुआ दिखाई दे रहा है।
नंबर वन की रेस कितनी जरुरी?
अभी कुछ ही दिन पहले भागीरथपुरा जलकांड हुआ, कई लोगों की जिंदगी को लील गया, पानी भी जानलेवा साबित हो गया, लेकिन अब गर्मी में शहरवासियों के लिए नई समस्या खड़ी हो गई है, नलों में पानी का वक्त तय नहीं, टैंकर के इंतजार में आंखें थक जाती है, वो भी आता है तो पानी पर्याप्त नहीं मिल पाता, कुल मिलाकर कहने का मतलब है कि नंबर वन की रेस में बुनियादी जरुरतों से क्या शहर पिछड़ता जा रहा है, या फिर नुमाइंदों के लिए जनता के हित से ज्यादा कुछ और जरुरी है?
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